नोटबंदी से फ़ायदे से उलट इसे लागू करने में रिजर्व बैंक को हज़ारों करोड़ का नुकसान अलग उठाना पड़ा. नए नोटों की प्रिटिंग
के लिए रिजर्व बैंक को 7,965 करोड़ रुपए ख़र्च करने पड़े. इसके अलावा नकदी
की किल्लत नहीं हो इसके लिए ज़्यादा नोट बाज़ार में जारी करने के चलते
17,426 करोड़ रुपए का ब्याज़ भी चुकाना पड़ा.
इसके अलावा देश भर के एटीएम को नए नोटों के मुताबिक कैलिब्रेट करने में भी करोड़ों रुपए का ख़र्च सिस्टम को उठाना पड़ा है.
ऐसे में नोटबंदी को लेकर सरकार केवल एक फ़ायदा गिना सकती है, 2017-2018 के इकॉनामिक सर्वे के मुताबिक नोटबंदी के बाद देश भर में टैक्स भरने
बहरहाल, पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने सात नवंबर, 2017 को भारतीय संसद में कहा था कि ये एक आर्गेनाइज्ड लूट (संगठित लूट) है, लीगलाइज्ड प्लंडर (क़ानूनी डाका) है.
मनमोहन सिंह के इस आरोप का जवाब देने में फ़िलहाल नरेंद्र मोदी सरकार बच रही है.
वाले लोगों की संख्या में 18 लाख की बढ़ोत्तरी हुई है.
सीबीआई और एटीएस के जासूस यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कट्टर हिंदुत्ववादी विचारधारा के अलावा भी क्या और कोई बात है, जो अलग-अलग मामलों में महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों से गिरफ़्तार किए गए इन युवकों को आपस में जोड़ती है.
10 अगस्त को मुंबई के नालासोपारा में मारे गए छापे में देसी बम, पिस्तौलों और अन्य विस्फोटक सामग्री का ज़खीरा मिलने के सिलसिले में एटीएस ने अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया है. मामले में मुख्य अभियुक्त वैभव राउत मुंबई के पास नालासोपारा इलाक़े में हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता और गौरक्षक के तौर पर पहचाने जाते हैं.
2015 में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर 'हिंदू गोवंश रक्षा समिति' नाम से संगठन बनाया था ताकि गायों को बूचड़खाने में ले जाने से रोका जा सके. वह कई बार 'सनातन' और 'हिंदू जनजागृति समिति' जैसे संगठनों के साथ मंच साझा कर चुके हैं.
इन संगठनों पर धुर दक्षिणपंथी प्रोपेगैंडा के कारण हमेशा से नज़र रही है और इनके सदस्यों पर पहले भी आतंकवादी गतिविधियों के आरोप लग चुके हैं. राउत पहले प्रमोद मुतालिक की "श्रीराम सेने" से भी जुड़े रहे हैं, जो 2009 में मंगलुरु में पब पर हमले के लिए सुर्ख़ियों में रहा है.
यूट्यूब पर उपलब्ध वीडियो में वैभव राउत एक ऑनलाइन डिबेट शो में शामिल होते समय ख़ुद को श्रीराम सेने का प्रतिनिधि बता रहे हैं.
नालासोपारा इलाके में राउत की पहचान एक रियल एस्टेट एजेंट के तौर पर है जो अक्सर गौ रक्षा रैलियों का आयोजन करते हैं. हमने उनके बचपन के दोस्त हर्षद राउत से बात की.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "हम सभी मांसाहारी हैं, लेकिन वैभव पूरी तरह शाकाहारी हो गए हैं. वो हमसे अक्सर पूछते थे कि दूसरे जानवारों की जान लेकर आपको क्या मिलेगा. फिर उनके जैसा आदमी कैसे इंसानों को मारने के बारे में सोच सकता है? मैंने गोरक्षा के लिए आयोजित की गई रैलियों में हिस्सा लिया है. वह वैलेंटाइन डे को 'मातृ-पितृ दिवस' के रूप में मनाया करते थे."
'सनातन' के प्रवक्ता चेतन राजहंस बताते हैं, "वैभव राउत की पहचान मुंबई में गौ रक्षा के लिए काम करने वाले हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता की है." हिंदू जनजागृति समिति के सुनील घनवट ने भी राउत से कोई रिश्ता होने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वह कभी उनके संगठन का हिस्सा नहीं रहे.
नालासोपारा विस्फोटक मामले की जांच के दौरान एटीएस ने मराठवाड़ा के जालना से शिवसेना के पूर्व पार्षद श्रीकांत पांगारकर को भी गिरफ्तार किया. ऐसा आरोप है कि इस मामले में अभियुक्त जो भी योजना बना रहे थे, उसके लिए आर्थिक मदद मुहैया करवाने की जिम्मेदारी पांगारकर को दी गई थी.
पांगारकर 2001 से 2011 के बीच दो बार जालना म्युनिसिपल काउंसिल के सदस्य चुने गए थे. वह पिछले दो महीनों से औरंगाबाद में रह रहे हैं.
हमने पांगारकर के बचपन के दोस्त और स्थानीय पत्रकार महेश बुलगे से बात की. महेश ने बताया, "उनके पिता बीजेपी में सक्रिय थे, लेकिन श्रीकांत शुरू से ही कट्टर हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता थे. इसीलिए उन्होंने शिवसेना को चुना. वह दो बार पार्षद चुने गए, 2011 में उन्हें टिकट नहीं मिला तो उन्होंने अपनी पत्नी को निर्दलीय चुनाव लड़ाया लेकिन वह हार गईं."
श्रीकांत के भाई अशोक पांगारकर जालना से भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा पार्षद हैं. वह कहते हैं कि श्रीकांत अभी भी शिवसेना के लिए काम कर रहे थे.
उन्होंने बताया, "वह हिंदू संस्कृति को बचाने के लिए काम कर रहे थे. अगर कोई हिंदू लड़की किसी अन्य धर्म में शादी करती थी तो वह उसे वापस लाते थे. वह रक्तदान शिविर भी लगाते थे. हम कैसे कह सकते हैं कि वह राजनीति से दूर हो गए थे? 2014 में अर्जुन खोतकर को जिताने के लिए उन्होंने शिवसेना के लिए काम किया था."
मगर खोतकर, जो अभी महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री हैं, कहते हैं कि मांगारकर कई सालों से शिवसेना के लिए काम नहीं कर रहे.
उन्होंने कहा, "जब उन्हें 2011 में पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो पार्टी के साथ उनका रिश्ता ख़त्म हो गया. बहुत लोग चुनाव के दौरान काम करते हैं. आप नहीं बता सकते कि वे पार्टी के लिए काम कर रहे हैं या नहीं. मुझे नहीं पता कि शिवसेना के बाद वह किसी और संगठन के साथ काम कर रहे थे."
नालासोपारा केस में पुणे से सुधन्वा गोंधलेकर की भी गिरफ्तारी हुई है. गोंधलेकर पश्चिमी महाराष्ट्र के सतारा के हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से पुणे में रह रहे थे.
वह एक समय 'शिव प्रतिष्ठान' के सदस्य थे. यह संभाजी भिडे का संगठन है, जिनका नाम भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में सामने आया था. लेकिन 'शिव प्रतिष्ठान' गोंधलेकर के साथ कोई रिश्ता होने से इनकार करता है.
शिव प्रतिष्ठान के प्रवक्ता नितीन चौगुले कहते हैं, "तीन चार साल पहले तक सतारा में हमारे कार्यक्रमों में वह हिस्सा लेते थे. उन्हें कोई ज़िम्मेदारी नहीं दी गई थी. फिर अचानक वह संगठन से चले गए. हमें लगा कि वह कारोबार के सिलसिले में पुणे चले गए हैं. उनके साथ वहां कोई संपर्क नहीं हुआ. हमें भरोसा नहीं होता कि ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों में शामिल है."
इसके अलावा देश भर के एटीएम को नए नोटों के मुताबिक कैलिब्रेट करने में भी करोड़ों रुपए का ख़र्च सिस्टम को उठाना पड़ा है.
ऐसे में नोटबंदी को लेकर सरकार केवल एक फ़ायदा गिना सकती है, 2017-2018 के इकॉनामिक सर्वे के मुताबिक नोटबंदी के बाद देश भर में टैक्स भरने
बहरहाल, पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने सात नवंबर, 2017 को भारतीय संसद में कहा था कि ये एक आर्गेनाइज्ड लूट (संगठित लूट) है, लीगलाइज्ड प्लंडर (क़ानूनी डाका) है.
मनमोहन सिंह के इस आरोप का जवाब देने में फ़िलहाल नरेंद्र मोदी सरकार बच रही है.
वाले लोगों की संख्या में 18 लाख की बढ़ोत्तरी हुई है.
पिछले एक पखवाड़े में सीबीआई और
महाराष्ट्र एटीएस ने चरमपंथी गतिविधियों में कथित रूप से शामिल रहने के
आरोप में आधा दर्जन से ज़्यादा युवकों को गिरफ़्तार किया है.
ये सभी
अतीत में कभी न कभी धुर दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों से जुड़े रहे हैं.
कार्रवाई अभी जारी है और जांच एजेंसियां ये माथापच्ची कर रही हैं कि ये
किसी संगठन के इशारे पर काम कर रहे थे या फिर इन लोगों ने अपने विचारों
वाले लोगों का नया समूह तैयार कर लिया था. और अगर ऐसा कोई समूह है तो उसका
मुखिया कौन है? ये और ऐसे कई सवाल जांच एजेंसियों के सामने हैं.सीबीआई और एटीएस के जासूस यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कट्टर हिंदुत्ववादी विचारधारा के अलावा भी क्या और कोई बात है, जो अलग-अलग मामलों में महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों से गिरफ़्तार किए गए इन युवकों को आपस में जोड़ती है.
10 अगस्त को मुंबई के नालासोपारा में मारे गए छापे में देसी बम, पिस्तौलों और अन्य विस्फोटक सामग्री का ज़खीरा मिलने के सिलसिले में एटीएस ने अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया है. मामले में मुख्य अभियुक्त वैभव राउत मुंबई के पास नालासोपारा इलाक़े में हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता और गौरक्षक के तौर पर पहचाने जाते हैं.
2015 में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर 'हिंदू गोवंश रक्षा समिति' नाम से संगठन बनाया था ताकि गायों को बूचड़खाने में ले जाने से रोका जा सके. वह कई बार 'सनातन' और 'हिंदू जनजागृति समिति' जैसे संगठनों के साथ मंच साझा कर चुके हैं.
इन संगठनों पर धुर दक्षिणपंथी प्रोपेगैंडा के कारण हमेशा से नज़र रही है और इनके सदस्यों पर पहले भी आतंकवादी गतिविधियों के आरोप लग चुके हैं. राउत पहले प्रमोद मुतालिक की "श्रीराम सेने" से भी जुड़े रहे हैं, जो 2009 में मंगलुरु में पब पर हमले के लिए सुर्ख़ियों में रहा है.
यूट्यूब पर उपलब्ध वीडियो में वैभव राउत एक ऑनलाइन डिबेट शो में शामिल होते समय ख़ुद को श्रीराम सेने का प्रतिनिधि बता रहे हैं.
नालासोपारा इलाके में राउत की पहचान एक रियल एस्टेट एजेंट के तौर पर है जो अक्सर गौ रक्षा रैलियों का आयोजन करते हैं. हमने उनके बचपन के दोस्त हर्षद राउत से बात की.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "हम सभी मांसाहारी हैं, लेकिन वैभव पूरी तरह शाकाहारी हो गए हैं. वो हमसे अक्सर पूछते थे कि दूसरे जानवारों की जान लेकर आपको क्या मिलेगा. फिर उनके जैसा आदमी कैसे इंसानों को मारने के बारे में सोच सकता है? मैंने गोरक्षा के लिए आयोजित की गई रैलियों में हिस्सा लिया है. वह वैलेंटाइन डे को 'मातृ-पितृ दिवस' के रूप में मनाया करते थे."
'सनातन' के प्रवक्ता चेतन राजहंस बताते हैं, "वैभव राउत की पहचान मुंबई में गौ रक्षा के लिए काम करने वाले हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता की है." हिंदू जनजागृति समिति के सुनील घनवट ने भी राउत से कोई रिश्ता होने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वह कभी उनके संगठन का हिस्सा नहीं रहे.
नालासोपारा विस्फोटक मामले की जांच के दौरान एटीएस ने मराठवाड़ा के जालना से शिवसेना के पूर्व पार्षद श्रीकांत पांगारकर को भी गिरफ्तार किया. ऐसा आरोप है कि इस मामले में अभियुक्त जो भी योजना बना रहे थे, उसके लिए आर्थिक मदद मुहैया करवाने की जिम्मेदारी पांगारकर को दी गई थी.
पांगारकर 2001 से 2011 के बीच दो बार जालना म्युनिसिपल काउंसिल के सदस्य चुने गए थे. वह पिछले दो महीनों से औरंगाबाद में रह रहे हैं.
हमने पांगारकर के बचपन के दोस्त और स्थानीय पत्रकार महेश बुलगे से बात की. महेश ने बताया, "उनके पिता बीजेपी में सक्रिय थे, लेकिन श्रीकांत शुरू से ही कट्टर हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता थे. इसीलिए उन्होंने शिवसेना को चुना. वह दो बार पार्षद चुने गए, 2011 में उन्हें टिकट नहीं मिला तो उन्होंने अपनी पत्नी को निर्दलीय चुनाव लड़ाया लेकिन वह हार गईं."
श्रीकांत के भाई अशोक पांगारकर जालना से भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा पार्षद हैं. वह कहते हैं कि श्रीकांत अभी भी शिवसेना के लिए काम कर रहे थे.
उन्होंने बताया, "वह हिंदू संस्कृति को बचाने के लिए काम कर रहे थे. अगर कोई हिंदू लड़की किसी अन्य धर्म में शादी करती थी तो वह उसे वापस लाते थे. वह रक्तदान शिविर भी लगाते थे. हम कैसे कह सकते हैं कि वह राजनीति से दूर हो गए थे? 2014 में अर्जुन खोतकर को जिताने के लिए उन्होंने शिवसेना के लिए काम किया था."
मगर खोतकर, जो अभी महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री हैं, कहते हैं कि मांगारकर कई सालों से शिवसेना के लिए काम नहीं कर रहे.
उन्होंने कहा, "जब उन्हें 2011 में पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो पार्टी के साथ उनका रिश्ता ख़त्म हो गया. बहुत लोग चुनाव के दौरान काम करते हैं. आप नहीं बता सकते कि वे पार्टी के लिए काम कर रहे हैं या नहीं. मुझे नहीं पता कि शिवसेना के बाद वह किसी और संगठन के साथ काम कर रहे थे."
नालासोपारा केस में पुणे से सुधन्वा गोंधलेकर की भी गिरफ्तारी हुई है. गोंधलेकर पश्चिमी महाराष्ट्र के सतारा के हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से पुणे में रह रहे थे.
वह एक समय 'शिव प्रतिष्ठान' के सदस्य थे. यह संभाजी भिडे का संगठन है, जिनका नाम भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में सामने आया था. लेकिन 'शिव प्रतिष्ठान' गोंधलेकर के साथ कोई रिश्ता होने से इनकार करता है.
शिव प्रतिष्ठान के प्रवक्ता नितीन चौगुले कहते हैं, "तीन चार साल पहले तक सतारा में हमारे कार्यक्रमों में वह हिस्सा लेते थे. उन्हें कोई ज़िम्मेदारी नहीं दी गई थी. फिर अचानक वह संगठन से चले गए. हमें लगा कि वह कारोबार के सिलसिले में पुणे चले गए हैं. उनके साथ वहां कोई संपर्क नहीं हुआ. हमें भरोसा नहीं होता कि ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों में शामिल है."
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