पिछले साल नवंबर की एक दोपहर मैं मुमुक्षु भवन के अहाते में नीम के एक विशाल पेड़ की छांव में खड़ी थी. पास के कमरे से भजन की आवाज़ आ रही थी. नाटे कद की एक महिला ने मेरे पास आकर नमस्ते किया. उनके हाथ में नमक पारे का एक बड़ा पैकेट था. उनकी उम्र करीब 80 साल रही होगी. उन्होंने मुझे नमक पारे खाने को दिया तो मैंने भूख नहीं होने की बात कही. उन्होंने प्यार से कहा "मैं तुम्हें बिना कुछ खाये जाने नहीं दूंगी." वह मुस्कुराईं तो मैंने एक नमक पारे लेकर खा लिया. वह थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ खाते रहने की सलाह देती हुई चली गईं. मैं उनसे भज न के बारे में पूछना चाहती थी लेकिन तब तक वह अहाते से निकल चुकी थीं. लॉज के मैनेजर मनीष कुमार पांडे ने बाद में मुझे बताया कि सरस्वती अग्रवाल विधवा हैं और उनकी कोई औलाद नहीं है. वह चा र साल पहले यहां आई थीं जब उनके पति का निधन हो गया था. उनके साथ रहने वाली गायत्री देवी राजस्थान की हैं. वह पिछले 5 साल से लॉज में रह रही हैं. उनका एक बेटा और दो बेटियां देश के दूसरे हिस्सों में रहते हैं, लेकिन वे शायद ही कभी मां से मिलने आते हैं. हम लॉज के अहाते में ही ...